बहस केवल सहमति में सार्थक हैं असहमति में नहीं, फिर चाहें हम कितने ही मीठे हो। आपसी सहमति के साथ की गई बहस दोनों पक्षों को आगे बढ़ाती हैं लेकिन असहमति में की गई बहस ठीक बुखार होने पर ठंडे पानी से नहाने जैसा हैं, इससे हमारा स्वाभिमान तो ठंडा पड़ता हैं पर बुखार और भी चढ़ जाता हैं।